कितने काम अधूरे रह गये
ये ज़िंदगी तेरी राहों में

मत तड़पा तू मुझ को ऐसे 
भर ले आ के बाहों में।

कितने काम अधूरे रह गये
उन खेत और खलिहानों में

कर दे पूरे सब काम अधूरे
मत तोल तू मुझ को पैमानों में।

कितने काम अधूरे रह गये
इस रंग बदलते संसार में

मत कर मलाल सब हैं मुसाफिर
इस ज़िंदगी और मौत के दरबार में।
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ना कर तेरा मेरा
एक दिन सब मिट्टी हो जाता है

रह जाता है यही सब
क्यौं तू मोह माया के

बीज बो जाता है।
तू मरता रहा पल पल

जिन अपनों के लिये 
वो तेरी अर्थी पर आके

दो आँसू रो जाता है
ना कर तेरा मेरा

एक दिन सब
मिट्टी हो जाता है।

ये कहकशाँ ये
महफिलें तू सजाता रहा

पर आखिरी सांस में
इंसान अकेला सो जाता है

सत्कर्म कर सत पथ पर चल
क्यों झूठी शान

मोह माया में खो जाता है।
ना कर तेरा मेरा

एक दिन सब मिट्टी हो जाता है।
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ये ज़िंदगी क्या है ? एक सूखा
हुआ पेड़ ही तो है
जो एक हवा का झोंका आये
और गिर जाये

क्योंकि इक ना इक दिन
सब को ही इस ज़िंदगी की
रेलगाड़ी से
उतर का चाँद सितारों में खो
जाना है

अब जाना ही है इक दिन तो
क्यों न कुछ ऐसा किया जाये
जब हम इस दुनियां से 
अलविदा ले रहे रहे होंगे
उस वक़्त हर इक की
आंखों में आंशू हो 

और जुवां पर शब्द हो
कि यार कुछ भी कहो
इन्शान बहुत अच्छा था,
ज़िन्दगी बहुत छोटी है बस इस को बड़ा कर के जियो.....
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ज़िन्दगी तेरी क़ीमत क्या है 
कभी तू सोने-चाँदी सी लगती है

कभी फिर तू राख माटी सी लगती है
कभी तू सपन सलौने सजाती है

कभी फिर बन दरियाँ आँख से बह जाती है
कभी तू मचलती बहारों सी लगती है

कभी फिर पतझड़ में उजड़ी नज़ारो सी लगती है
कभी तू चंचल शोख अदाओं सी लगती है
कभी फिर जो पूरी ना हो उन दुआओं सी लगती है
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