वो मेरा मिट्टी का घर 
मेरे आंगन की चारपाई

वो पीपल का पेड़ 
फिर चलती पुरवाई 

वो फूलों का बगीचा
और लह-लहाते खेत 

वो मिट्टी की क्यारी
फिर नदी की रेत

वो कुएँ का पानी
मिट्टी की सुराही

पीता था आ कर
वो चलता हुआ राही 

वो गाँव के मेले 
सावन के झूले

वो सर्बत का गोला
और चाट के ठेले

याद करता हूँ अब भी
उस मिट्टी के घर को

उस प्यारे सफर को
उस मीठी डगर को
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चलो इक पेड़ लगाते है
धरा को खुशहाल बनाते है

फिर इक चलता राही आयेगा
जो चलते चलते थक जायेगा

उसी पेड़ की छाँव में आ कर
मन को शीतल कर जायेगा

देख हरी-भरी धरा को फिर
वो मंद-मंद मुस्कायेगा

हृदय होगा हर्षोल्लित उसका
जब पेड़ की ओर नज़र उठायेगा

जो लगे होंगे फल-फूल उस पे
थोड़ा चख कर भूख मिटायेगा

उसी पेड़ की छाँव के नीचे
हमें लाख दुआएँ दे जायेगा

चलो इक पेड़ लगाते है
धरा को खुशहाल बनाते है
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चट्टानों से गिर कर मैं सागर में आ जाती हूँ 
इतना गिरने के बाद भी हर दिल को भा जाती हूँ।
कल कल की आवाज में प्यारे गीत सुनाती हूँ 
चट्टानों से गिर कर मैं सागर में आ जाती हूँ।

पत्थरो से टकरा कर दिल जख्मी है मेरा
फिर भी लाखों की प्यास बुझाती हूँ।

कब मिलेगा इन वादियों का हमसफर मुझे
यही सोच-सोच कर घबराती हूँ।

लाख गम हैं दिल मेरे, फिर भी
उछलती कूदती और मुस्कराती हूँ।

चट्टानों से गिर कर मैं सागर में आ जाती हूँ 
सागर ही मंज़िल मेरी सागर ही कारवां 

बस सागर में ही समा जाती हूँ।
गिर कर उँचे झरनों से अपने अस्तित्व को खोती नहीं

एक सुन्दरता हर बार मैं ला जाती हूँ।
ना जमीं ना आसमाँ ना ही कोई फरिस्ता हूँ 

मैं तो बस चट्टानों से गिरती हुई एक नदी हूँ
सागर ने ही समाया मुझे अपने अन्दर 

बस उसी के एहसान तले दबी हूँ। 
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कभी चले आओ हमारे गाँव में
दोनो बैठेगें फिर पीपल की छाँव में।

उंचे नीचे हैं पर्वत पथरीले हैं रास्ते
चलना सम्भल कर कांटा ना चुभ जाये पावँ में।

जब आओगे तुम तो प्यार भरी बातें होंगी 
हाथ में हाथ लिए बैठेगें दोनो फिर नाव में।

कभी चले आओ हमारे गाँव में
दोनों बैठेंगे फिर पीपल की छाँव में।
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लियी है करवट मौसम ने
झुलसे हैं अब पावं देखो

भागे हैं पशु पक्षी सारे
उस घनी पीपल की छावं देखो

सूर्य देव बरसाये गर्मी
माँ गंगा भी सुखी जाये

मरु भूमि बनी है धरती
हे मानव तू जिस ओर जाये

ये सूखी धरा हरी हो जाती
जब मानव तू पेड़ लगाये

कर संकल्प लगा दे पेड़
आगे की पीढ़ी तेरे गुणगान गाये।
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